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‘झाड़ फूंक’ Movie Review: सुम्बुल का डर, यशपाल का रहस्य और पद्मिनी का अभिनय, क्या दर्शकों को बांध पाएगी यह हॉरर कहानी?

हॉरर फिल्मों में डर के साथ रहस्य और रोमांच का होना बेहद जरूरी है। अगर कहानी दर्शकों के मन में लगातार सवाल पैदा करती रहे, तो फिल्म का अनुभव और दिलचस्प हो जाता है। निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘झाड़ फूंक’ भी इसी कोशिश के साथ दर्शकों के सामने आई है। फिल्म में सुम्बुल तौकीर खान, यशपाल शर्मा, पद्मिनी कोल्हापुरे और हर्ष राजपूत मुख्य भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। कहानी एक गर्भवती महिला आस्था के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका प्रेमी अचानक गायब हो जाता है और वह एक रहस्यमयी परिवार के बीच फंस जाती है। अंधविश्वास, डर, तंत्र-मंत्र और अलौकिक घटनाओं से भरी यह फिल्म कई सवाल खड़े करती है। 30 अक्टूबर 2026 को जियोहॉटस्टार पर रिलीज हुई इस फिल्म की अवधि लगभग 1 घंटा 53 मिनट है।

कहानी: गायब प्रेमी और रहस्यमयी घर का खौफ

फिल्म की कहानी आस्था (सुम्बुल तौकीर खान) और राजवीर (हर्ष राजपूत) से शुरू होती है। आस्था गर्भवती है और राजवीर के साथ उत्तराखंड से दिल्ली की ओर सफर कर रही है। दोनों के रिश्ते में तनाव है, क्योंकि आस्था चाहती है कि राजवीर उससे शादी करे और अपने परिवार को उनके रिश्ते के बारे में बताए। इसी दौरान सुनसान रास्ते पर एक रहस्यमयी महिला अचानक उनकी कार के सामने आ जाती है। उसे बचाने की कोशिश में कार का एक्सीडेंट हो जाता है।

जब आस्था को होश आता है, तो वह खुद को एक अनजान घर में पाती है। वहां मोहन ठाकुर (यशपाल शर्मा), उनकी पत्नी कामिनी (पद्मिनी कोल्हापुरे) और उनका पोता मोक्ष (अप्रतिम सिंह) उसकी देखभाल कर रहे होते हैं। लेकिन आस्था को सबसे ज्यादा चिंता राजवीर की होती है। जब वह उसके बारे में पूछती है, तो उसे बताया जाता है कि दुर्घटना के समय वह कार में अकेली थी। यह बात आस्था को हैरान कर देती है। धीरे-धीरे घर में अजीब घटनाएं होने लगती हैं और उसे महसूस होता है कि वहां कुछ ऐसा है, जिसे उससे छिपाया जा रहा है।

मोहन और कामिनी उसे मंजरी नाम की एक महिला की कहानी सुनाते हैं। बताया जाता है कि कई साल पहले गांव वालों ने मंजरी और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की हत्या कर दी थी। इसके बाद उसने गांव में किसी बच्चे को जन्म नहीं लेने देने की कसम खाई थी। अब आस्था को अपनी और अपने होने वाले बच्चे की सुरक्षा की चिंता सताने लगती है। क्या मंजरी की आत्मा सचमुच इस घर में मौजूद है? राजवीर कहां गायब हो गया? इन सवालों के जवाब फिल्म के सस्पेंस का हिस्सा हैं।

निर्देशन और कहानी: दिलचस्प शुरुआत, लेकिन रफ्तार में उतार-चढ़ाव

फिल्म का कॉन्सेप्ट काफी दिलचस्प है। एक गर्भवती महिला, उसका अचानक गायब हुआ प्रेमी और एक ऐसा परिवार, जिसकी असलियत पर भरोसा करना मुश्किल है। ये सभी पहलू कहानी में रहस्य और डर पैदा करने की अच्छी संभावना रखते हैं। निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा शुरुआत से ही दर्शकों को अनिश्चितता के माहौल में रखने की कोशिश करते हैं।

फिल्म के कई दृश्यों में डर और सस्पेंस का माहौल बनता है। खासकर जब आस्था घर के भीतर अजीब आवाजें और अनजान घटनाएं महसूस करती है, तब कहानी थोड़ी पकड़ बनाती है। प्रीक्लाइमैक्स में रहस्य खुलने की प्रक्रिया भी दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाती है। हालांकि, फिल्म की रफ्तार कुछ जगह धीमी पड़ जाती है। कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं और कहानी में कई घटनाओं के बीच बेहतर जुड़ाव की गुंजाइश महसूस होती है।

फिल्म अंधविश्वास और उसके नाम पर होने वाले शोषण जैसे गंभीर विषय को भी छूती है। यह इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन कहानी इस विषय को और गहराई से दिखा सकती थी। क्लाइमैक्स भी कुछ दर्शकों को जल्दबाजी में समेटा हुआ महसूस हो सकता है।

अभिनय: यशपाल शर्मा और पद्मिनी कोल्हापुरे का मजबूत प्रदर्शन

अभिनय के मामले में यशपाल शर्मा फिल्म के प्रमुख आकर्षण हैं। मोहन ठाकुर के किरदार में वह एक तरफ मददगार और दूसरी तरफ रहस्यमयी दिखाई देते हैं। उनके चेहरे के भाव और संवाद अदायगी कहानी के तनाव को बढ़ाते हैं। पद्मिनी कोल्हापुरे भी कामिनी के किरदार में प्रभाव छोड़ती हैं। उनका शांत और रहस्यमयी अंदाज दर्शकों के मन में सवाल पैदा करता है कि आखिर इस परिवार की असलियत क्या है।

सुम्बुल तौकीर खान ने आस्था के किरदार में डर, बेचैनी और असुरक्षा दिखाने की कोशिश की है। अनजान जगह पर फंसी गर्भवती महिला की परेशानी को वह सहज तरीके से पेश करती हैं। हर्ष राजपूत की भूमिका कहानी के शुरुआती हिस्से में अहम है, हालांकि उनके किरदार को और गहराई दी जा सकती थी। अप्रतिम सिंह भी अपनी भूमिका में कहानी का हिस्सा बने रहते हैं।

संगीत और तकनीकी पक्ष

फिल्म का संगीत कहानी के माहौल के अनुरूप रखा गया है। ‘बेतहाशा’ गाना सुनने में अच्छा लगता है और फिल्म की प्रस्तुति में थोड़ी ताजगी लाता है। वहीं, बैकग्राउंड म्यूजिक कुछ दृश्यों में जरूरत से ज्यादा प्रभाव डालने की कोशिश करता है। हॉरर फिल्मों में कई बार खामोशी और छोटे-छोटे संकेत ज्यादा डर पैदा करते हैं। इस लिहाज से संगीत और ध्वनि प्रभावों में थोड़ा संयम फिल्म को और प्रभावशाली बना सकता था।

देखें या नहीं? अंतिम फैसला

‘झाड़ फूंक’ एक दिलचस्प विचार पर बनी हॉरर-सस्पेंस फिल्म है। इसमें यशपाल शर्मा और पद्मिनी कोल्हापुरे का अभिनय मजबूत है, जबकि सुम्बुल तौकीर खान कहानी को भावनात्मक आधार देती हैं। फिल्म में रहस्य और कुछ प्रभावशाली दृश्य हैं, लेकिन धीमी रफ्तार, कमजोर स्क्रीनप्ले और जल्दबाजी वाला क्लाइमैक्स इसके प्रभाव को सीमित करते हैं।

अगर आपको भूत-प्रेत, अंधविश्वास, रहस्यमयी घर और सस्पेंस से जुड़ी कहानियां पसंद हैं, तो ‘झाड़ फूंक’ एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप लगातार डराने वाले दृश्यों और बेहद मजबूत क्लाइमैक्स की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी।

रेटिंग: 3/5 स्टार

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