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‘दायरा’ Review: करीना और पृथ्वीराज की दमदार टक्कर में कानून से बड़ा बना जमीर, इंसाफ और सच का सवाल, जानिए फिल्म कैसी

मेघना गुलजार की फिल्म ‘दायरा’ एक ऐसी कहानी लेकर आती है, जो दर्शकों को सिर्फ मनोरंजन नहीं देती, बल्कि उन्हें कानून, इंसाफ, नैतिकता और अंतरात्मा के बीच खड़े मुश्किल सवालों से रूबरू कराती है। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन जैसे दो शानदार कलाकारों की मौजूदगी फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है। फिल्म का विषय गंभीर है और इसकी कहानी ऐसे मोड़ पर ले जाती है, जहां सही और गलत के बीच फैसला करना आसान नहीं रहता। मेघना गुलजार ने कहानी को भावनात्मक बनाने के साथ-साथ सामाजिक और कानूनी सवालों से जोड़ने की कोशिश की है। यही वजह है कि ‘दायरा’ को सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा या क्राइम स्टोरी के रूप में देखना इसके दायरे को छोटा करना होगा। फिल्म असल में यह पूछती है कि जब कानून और इंसाफ के बीच अंतर दिखाई देने लगे, तब इंसान किसका साथ दे और अपने जमीर की आवाज को कितनी अहमियत दे।

फिल्म में करीना कपूर खान का किरदार कहानी के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देता है। वह एक ऐसी महिला की भूमिका में दिखाई देती हैं, जो परिस्थितियों से लड़ते हुए अपने विश्वास और न्याय की तलाश के बीच संघर्ष करती है। करीना ने किरदार के भीतर मौजूद गुस्से, दर्द, मजबूरी और दृढ़ता को स्क्रीन पर उतारने की कोशिश की है। दूसरी तरफ पृथ्वीराज सुकुमारन का किरदार कहानी को एक अलग दिशा देता है। उनके किरदार में आत्मविश्वास के साथ-साथ कई परतें दिखाई देती हैं। दोनों कलाकारों के बीच होने वाली टक्कर फिल्म को आगे बढ़ाती है। यह टक्कर केवल दो व्यक्तियों की नहीं, बल्कि दो सोच और दो नजरियों की भी है। एक तरफ कानून की सीमाएं हैं और दूसरी तरफ इंसाफ पाने की इच्छा। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, दर्शक यह सोचने पर मजबूर होते हैं कि कानून की किताब में जो सही है, क्या वह हर परिस्थिति में नैतिक रूप से भी सही होता है।

‘दायरा’ की सबसे बड़ी खासियत इसका विषय है। फिल्म सीधे-सीधे जवाब देने के बजाय सवाल खड़े करने पर ज्यादा ध्यान देती है। कहानी में कानून की प्रक्रिया, सबूतों की अहमियत और इंसाफ पाने की कोशिश के साथ मानवीय भावनाओं को भी जगह दी गई है। कई ऐसे क्षण आते हैं, जहां दर्शक खुद तय करने की कोशिश करते हैं कि आखिर सही कौन है। मेघना गुलजार की फिल्मों में सामाजिक मुद्दों को संवेदनशीलता के साथ पेश करने की कोशिश दिखाई देती रही है और ‘दायरा’ में भी यही नजर आता है। फिल्म किसी एक पक्ष को पूरी तरह सही या गलत साबित करने के बजाय परिस्थितियों की जटिलता दिखाती है। यही बात इसे सामान्य मसाला फिल्मों से अलग करती है। हालांकि गंभीर विषय के कारण फिल्म की गति कुछ हिस्सों में धीमी महसूस हो सकती है। जिन दर्शकों को तेज रफ्तार कहानी और लगातार ट्विस्ट पसंद हैं, उन्हें कुछ हिस्से थोड़े लंबे लग सकते हैं।

तकनीकी रूप से फिल्म का ट्रीटमेंट कहानी के मूड के अनुरूप रखा गया है। सिनेमैटोग्राफी में अंधेरे और गंभीर टोन का इस्तेमाल कहानी के तनाव को बढ़ाता है। बैकग्राउंड म्यूजिक भी कई महत्वपूर्ण दृश्यों में माहौल बनाने का काम करता है। कोर्टरूम और जांच से जुड़े दृश्यों में संवादों को विशेष महत्व दिया गया है। फिल्म की कहानी में ऐसे कई संवाद हैं, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। हालांकि कुछ जगहों पर फिल्म का संदेश थोड़ा ज्यादा स्पष्ट तरीके से सामने आता है, जिससे कहानी की स्वाभाविकता थोड़ी प्रभावित होती है। इसके बावजूद कलाकारों की परफॉर्मेंस कई कमजोरियों को संभाल लेती है। करीना और पृथ्वीराज के आमने-सामने वाले दृश्यों में अभिनय की ताकत साफ दिखाई देती है। दोनों कलाकार कहानी की गंभीरता को समझते हुए अपने किरदारों को निभाते नजर आते हैं।

फिल्म का एक अहम पहलू यह है कि यह इंसाफ की परिभाषा पर सवाल उठाती है। क्या अदालत का फैसला ही हमेशा अंतिम इंसाफ होता है? क्या परिस्थितियों के आधार पर किसी व्यक्ति के फैसले को समझना जरूरी नहीं है? क्या कानून की सीमाओं के बाहर जाकर लिया गया फैसला कभी नैतिक रूप से सही हो सकता है? ‘दायरा’ इन सवालों को सीधे दर्शकों के सामने रखती है। फिल्म का उद्देश्य शायद हर सवाल का जवाब देना नहीं, बल्कि दर्शकों को अपनी राय बनाने का मौका देना है। यही वजह है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी इसकी कहानी और किरदारों को लेकर चर्चा जारी रह सकती है। सामाजिक और कानूनी विषयों पर आधारित फिल्मों में यही सबसे बड़ी सफलता मानी जा सकती है कि दर्शक थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी उसके बारे में सोचता रहे।

कुल मिलाकर, ‘दायरा’ एक गंभीर और विचारोत्तेजक फिल्म के रूप में सामने आती है। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की टक्कर कहानी को मजबूत आधार देती है, जबकि मेघना गुलजार का निर्देशन इसे सामाजिक और भावनात्मक गहराई देने की कोशिश करता है। फिल्म की रफ्तार कुछ जगह धीमी जरूर पड़ती है और कुछ हिस्सों में संदेश थोड़ा भारी महसूस हो सकता है, लेकिन इसका विषय और कलाकारों का अभिनय दर्शकों को जोड़े रखते हैं। अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं, जो सिर्फ मनोरंजन के बजाय समाज, कानून और इंसानी फैसलों पर सवाल उठाती हैं, तो ‘दायरा’ आपको सोचने पर मजबूर कर सकती है। फिल्म का सबसे बड़ा सवाल यही रह जाता है—जब कानून, इंसाफ और जमीर तीन अलग दिशाओं में खड़े हों, तो आखिर इंसान किस रास्ते को चुने?

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