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‘आर्यभट्ट का जीरो’ रिव्यू: हिमांश कोहली के दमदार अभिनय ने जीता दिल, मगर कमजोर स्क्रीनप्ले ने फिल्म को रोका

बॉलीवुड में समय-समय पर ऐसी फिल्में आती हैं जो बड़े सितारों या भारी-भरकम एक्शन के बजाय अपनी कहानी और भावनात्मक प्रस्तुति के दम पर दर्शकों का दिल जीतने की कोशिश करती हैं। ‘आर्यभट्ट का जीरो’ भी ऐसी ही फिल्मों में शामिल है। फिल्म में हिमांश कोहली मुख्य भूमिका में नजर आते हैं और उन्होंने अपने सहज अभिनय से किरदार को जीवंत बनाने की पूरी कोशिश की है। हालांकि, फिल्म की सादगी इसकी सबसे बड़ी ताकत भी बनती है और कुछ जगह इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी महसूस होती है।

फिल्म की कहानी एक ऐसे युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने सपनों, संघर्षों और जीवन की चुनौतियों के बीच खुद को साबित करने की कोशिश करता है। कहानी में भावनात्मक पहलू को प्रमुखता दी गई है और कई ऐसे दृश्य हैं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। निर्देशक ने कहानी को बहुत अधिक जटिल बनाने के बजाय सरल और यथार्थवादी अंदाज में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि फिल्म आम दर्शकों से आसानी से जुड़ने की कोशिश करती है।

हिमांश कोहली इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरते हैं। उन्होंने अपने किरदार की भावनाओं, संघर्ष और आत्मविश्वास को बेहद संतुलित तरीके से पर्दे पर उतारा है। कई दृश्यों में उनका अभिनय प्रभावशाली लगता है और वह बिना किसी बनावटीपन के दर्शकों को कहानी से जोड़ने में सफल रहते हैं। उनके चेहरे के भाव और संवाद अदायगी यह साबित करते हैं कि वह लगातार एक अभिनेता के रूप में खुद को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

सहायक कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। सभी कलाकार कहानी की जरूरत के अनुसार स्वाभाविक अभिनय करते हैं, जिससे फिल्म में वास्तविकता का एहसास बना रहता है। हालांकि कुछ किरदारों को और अधिक गहराई दी जा सकती थी, जिससे कहानी का भावनात्मक प्रभाव और मजबूत बनता।

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसकी एक और खासियत है। कई दृश्य बेहद खूबसूरती से फिल्माए गए हैं और कैमरे का काम कहानी के माहौल को बेहतर बनाने में मदद करता है। बैकग्राउंड म्यूजिक भी कई भावुक दृश्यों में अच्छा असर छोड़ता है। हालांकि कुछ जगहों पर संगीत का प्रभाव उतना मजबूत महसूस नहीं होता, जितनी कहानी की मांग थी।

फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती इसका स्क्रीनप्ले है। शुरुआती हिस्से में कहानी अच्छी गति से आगे बढ़ती है, लेकिन इंटरवल के बाद कुछ दृश्य लंबे महसूस होते हैं। कई जगह कहानी की रफ्तार धीमी पड़ जाती है, जिससे दर्शकों की दिलचस्पी थोड़ी कम हो सकती है। यदि संपादन थोड़ा और कसावट भरा होता, तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर हो सकता था।

निर्देशन की बात करें तो निर्देशक ने कहानी को ईमानदारी से प्रस्तुत करने की कोशिश की है। फिल्म में अनावश्यक मसाला, जबरदस्ती का हास्य या बेवजह के एक्शन दृश्य नहीं जोड़े गए हैं। यही इसकी अलग पहचान बनाता है। हालांकि कुछ भावनात्मक दृश्यों को और प्रभावशाली बनाया जा सकता था, जिससे दर्शकों के साथ गहरा जुड़ाव बनता।

फिल्म का संवाद लेखन भी काफी सरल रखा गया है। कई संवाद सीधे दिल तक पहुंचते हैं और कहानी के संदेश को मजबूती देते हैं। हालांकि कुछ जगहों पर संवाद अधिक प्रभावशाली हो सकते थे। इसके बावजूद फिल्म अपनी सादगी के कारण अलग पहचान बनाने में सफल रहती है।

यदि आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो बड़े बजट और भव्यता के बजाय कहानी, अभिनय और भावनाओं पर आधारित हों, तो ‘आर्यभट्ट का जीरो’ आपको पसंद आ सकती है। यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ जीवन के संघर्ष, उम्मीद और आत्मविश्वास का संदेश भी देती है। हालांकि तेज रफ्तार और ट्विस्ट से भरपूर फिल्मों के शौकीनों को इसकी धीमी गति थोड़ी निराश कर सकती है।

फाइनल वर्डिक्ट:
‘आर्यभट्ट का जीरो’ एक ईमानदार प्रयास है, जिसमें हिमांश कोहली का अभिनय सबसे मजबूत पक्ष बनकर सामने आता है। फिल्म की सादगी और भावनात्मक कहानी इसकी खूबी है, लेकिन धीमा स्क्रीनप्ले और कुछ कमजोर हिस्से इसे पूरी तरह यादगार बनने से रोकते हैं। अगर आप कंटेंट आधारित सिनेमा पसंद करते हैं, तो यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है।

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