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‘डीसी’ मूवी रिव्यू: लोकेश कनगराज का अभिनय कितना असरदार, क्या शानदार स्टाइल और एक्शन के पीछे कहानी कमजोर पड़ गई?

साउथ सिनेमा में निर्देशक के तौर पर अपनी खास पहचान बना चुके लोकेश कनगराज अब अभिनेता के रूप में दर्शकों के सामने आए हैं। उनकी फिल्म ‘डीसी’ को लेकर रिलीज से पहले ही काफी चर्चा थी, क्योंकि दर्शक उन्हें कैमरे के पीछे नहीं बल्कि उसके सामने देखने के लिए उत्सुक थे। फिल्म में उनका अभिनय, एक्शन और स्क्रीन प्रेजेंस आकर्षण का केंद्र है। हालांकि फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या यह सिर्फ स्टाइल और एक्शन के सहारे आगे बढ़ती है या फिर इसके पीछे एक मजबूत कहानी भी मौजूद है?

‘डीसी’ की सबसे बड़ी खासियत इसका विजुअल ट्रीटमेंट है। फिल्म के शुरुआती दृश्यों से ही निर्देशक ने एक अलग तरह का माहौल बनाने की कोशिश की है। डार्क टोन, स्टाइलिश कैमरा वर्क, तेज एडिटिंग और दमदार बैकग्राउंड स्कोर मिलकर फिल्म को एक खास सिनेमाई अनुभव देते हैं। एक्शन पसंद करने वाले दर्शकों के लिए कई ऐसे सीक्वेंस हैं, जो उन्हें सीट से बांधे रखने में सफल होते हैं।

लोकेश कनगराज की बात करें तो अभिनेता के रूप में उनकी मौजूदगी फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण है। कैमरे के पीछे उनकी पकड़ पहले से साबित है, लेकिन पर्दे पर उनका अंदाज थोड़ा अलग नजर आता है। उन्होंने अपने किरदार को आत्मविश्वास के साथ निभाने की कोशिश की है। कई दृश्यों में उनका हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज प्रभावशाली लगता है। खासकर एक्शन सीन्स में वह अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से ध्यान खींचते हैं।

हालांकि अभिनय के मामले में फिल्म पूरी तरह संतुष्ट नहीं करती। कुछ भावनात्मक दृश्यों में लोकेश की परफॉर्मेंस उतनी गहराई नहीं ला पाती, जितनी कहानी की मांग होती है। उनके किरदार को और अधिक परतें दी जातीं तो दर्शकों का जुड़ाव मजबूत हो सकता था। एक निर्देशक के तौर पर जिस तरह वह किरदारों को स्थापित करने के लिए जाने जाते हैं, उसी स्तर की गहराई उनके अभिनय में हर जगह दिखाई नहीं देती।

फिल्म की कहानी एक ऐसे किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो परिस्थितियों के कारण एक खतरनाक दुनिया में प्रवेश करता है। इसके बाद कहानी में संघर्ष, दुश्मनी, रहस्य और एक्शन का सिलसिला शुरू होता है। मेकर्स ने कहानी में कई ट्विस्ट डालने की कोशिश की है, लेकिन कुछ मोड़ अनुमान लगाने लायक लगते हैं। यही वजह है कि फिल्म का पहला हिस्सा दर्शकों को जितना उत्साहित करता है, बाद के हिस्से में वही गति कुछ जगह कमजोर पड़ती दिखाई देती है।

स्क्रीनप्ले फिल्म की कमजोर कड़ी बनकर सामने आता है। कई एक्शन सीक्वेंस शानदार होने के बावजूद उनके बीच कहानी को पर्याप्त जगह नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि कुछ दृश्यों को सिर्फ स्टाइल और विजुअल इम्पैक्ट बढ़ाने के लिए रखा गया है। अगर कहानी और किरदारों को थोड़ा ज्यादा समय दिया जाता, तो फिल्म का भावनात्मक प्रभाव काफी बेहतर हो सकता था।

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर हालांकि काफी मजबूत है। एक्शन दृश्यों में संगीत ऊर्जा बढ़ाता है और कई महत्वपूर्ण पलों को सिनेमाई वजन देता है। सिनेमैटोग्राफी भी फिल्म की खूबसूरती बढ़ाती है। कैमरा मूवमेंट, लो-लाइट सीक्वेंस और एक्शन की कोरियोग्राफी पर खास मेहनत दिखाई देती है।

सपोर्टिंग कास्ट ने भी कहानी को संभालने की कोशिश की है। कुछ कलाकार अपने किरदारों में अच्छे लगते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त स्क्रीन टाइम नहीं मिलता। कई पात्र ऐसे हैं जिनमें संभावनाएं दिखाई देती हैं, मगर कहानी आगे बढ़ने के साथ उनका महत्व कम हो जाता है।

फिल्म का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह दर्शकों को एक संपूर्ण सिनेमाई अनुभव दे पाती है? इसका जवाब थोड़ा मिला-जुला है। यदि आप शानदार विजुअल्स, स्टाइलिश एक्शन और तेज-तर्रार सीक्वेंस पसंद करते हैं, तो ‘डीसी’ आपको मनोरंजन दे सकती है। लेकिन अगर आप मजबूत कहानी, गहरे किरदार और लगातार भावनात्मक जुड़ाव की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो फिल्म कुछ जगह निराश कर सकती है।

कुल मिलाकर, ‘डीसी’ लोकेश कनगराज को अभिनेता के रूप में देखने का दिलचस्प मौका देती है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और फिल्म का तकनीकी पक्ष प्रभावशाली है, लेकिन कहानी और स्क्रीनप्ले में कुछ कमियां नजर आती हैं। फिल्म कई मौकों पर स्टाइल और एक्शन के दम पर आगे बढ़ती है, जबकि कहानी को और मजबूत बनाए जाने की जरूरत महसूस होती है।

फाइनल वर्डिक्ट

‘डीसी’ एक स्टाइलिश और एक्शन से भरपूर फिल्म है, लेकिन इसकी असली ताकत कहानी नहीं बल्कि इसका विजुअल ट्रीटमेंट और लोकेश कनगराज की स्क्रीन प्रेजेंस है। एक्शन प्रेमियों के लिए यह बेहतर विकल्प हो सकती है, जबकि कहानी-केंद्रित दर्शकों को थोड़ी कमी महसूस हो सकती है।

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