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Movie Review – ‘भाई तेरा स्टार है’ राघव जुयाल की सोलो लीड फीकी पड़ी, कमजोर कहानी और बेजान कॉमेडी ने किया निराश

कॉमेडी फिल्मों का उद्देश्य दर्शकों को हंसाना और हल्के-फुल्के मनोरंजन के साथ थिएटर से मुस्कुराते हुए बाहर भेजना होता है। लेकिन ‘भाई तेरा स्टार है’ इस कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। राघव जुयाल की पहली सोलो लीड फिल्म होने के कारण दर्शकों को इससे काफी उम्मीदें थीं, लेकिन फिल्म की कमजोर कहानी, बिखरी हुई पटकथा और फीके हास्य ने इन उम्मीदों को काफी हद तक निराश किया है। जहां फिल्म को मनोरंजन का भरपूर पैकेज बनना चाहिए था, वहीं यह कई जगह अपनी दिशा खोती हुई नजर आती है।

फिल्म की कहानी एक ऐसे आम युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अचानक स्टारडम की दुनिया में पहुंच जाता है। इसके बाद उसके जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव, रिश्तों की उलझनें और शोहरत के पीछे छिपी चुनौतियों को कॉमिक अंदाज में दिखाने की कोशिश की गई है। कहानी का विचार नया नहीं है, लेकिन इसे रोचक बनाने का अवसर पटकथा पूरी तरह गंवा देती है। कई दृश्य पहले से अनुमानित लगते हैं और दर्शकों को बांधकर रखने में असफल रहते हैं।

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी स्क्रिप्ट है। कहानी आगे बढ़ने के बजाय कई जगह एक ही तरह के दृश्यों में उलझ जाती है। हास्य पैदा करने के लिए लिखे गए संवाद प्रभाव नहीं छोड़ते और कई जोक्स पुराने या जबरदस्ती डाले हुए महसूस होते हैं। दर्शक जिन पलों पर खुलकर हंसने की उम्मीद करते हैं, वहां फिल्म सिर्फ हल्की मुस्कान तक सीमित रह जाती है। इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार और भी धीमी पड़ जाती है, जिससे दर्शकों का जुड़ाव कम होने लगता है।

राघव जुयाल ने मुख्य भूमिका में पूरी मेहनत की है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी है और वह अपने किरदार को ईमानदारी से निभाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। डांस और कॉमिक टाइमिंग के लिए मशहूर राघव कई दृश्यों में ऊर्जा भी लेकर आते हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनकी मेहनत पर भारी पड़ता है। एक मजबूत स्क्रिप्ट और बेहतर निर्देशन उन्हें अपनी अभिनय क्षमता दिखाने का अधिक अवसर दे सकता था।

सहायक कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को ठीक-ठाक निभाया है, लेकिन उन्हें भी पर्याप्त स्क्रीन स्पेस और प्रभावशाली संवाद नहीं मिले। कई किरदार केवल कहानी को आगे बढ़ाने के लिए दिखाई देते हैं और उनका भावनात्मक या हास्यपूर्ण प्रभाव ज्यादा देर तक नहीं टिकता। फिल्म में कुछ कैमियो और सपोर्टिंग रोल दिलचस्प हो सकते थे, लेकिन उनका भी पूरा उपयोग नहीं किया गया।

निर्देशन की बात करें तो फिल्म कई जगह बिखरी हुई महसूस होती है। निर्देशक ने मनोरंजन, भावनाओं और कॉमेडी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। कई दृश्य बिना किसी खास प्रभाव के गुजर जाते हैं और कहानी में वह पकड़ नहीं बन पाती जो एक अच्छी कॉमेडी फिल्म की पहचान होती है।

तकनीकी रूप से फिल्म औसत स्तर की है। सिनेमैटोग्राफी ठीक है और कुछ लोकेशन आकर्षक लगती हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश करता है, लेकिन यादगार नहीं बन पाता। गीत-संगीत भी फिल्म को अतिरिक्त मजबूती नहीं दे पाता। एडिटिंग थोड़ी और सधी होती तो फिल्म की गति बेहतर हो सकती थी।

फिल्म का सबसे सकारात्मक पहलू राघव जुयाल का आत्मविश्वास और उनकी ईमानदार कोशिश है। उन्होंने अपनी पहली सोलो लीड फिल्म में खुद को साबित करने का पूरा प्रयास किया है। हालांकि केवल अभिनय के दम पर किसी फिल्म को सफल नहीं बनाया जा सकता। जब कहानी और पटकथा कमजोर हों, तो कलाकारों का प्रदर्शन भी सीमित प्रभाव छोड़ता है।

यदि आप हल्की-फुल्की कॉमेडी की उम्मीद से यह फिल्म देखने जा रहे हैं, तो संभव है कि यह आपकी अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी न उतरे। फिल्म में कुछ मनोरंजक पल जरूर हैं, लेकिन वे पूरी कहानी को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। बेहतर लेखन और मजबूत हास्य के साथ यह फिल्म कहीं अधिक प्रभावशाली बन सकती थी।

रेटिंग: ⭐⭐☆☆☆ (2/5)

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