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Movie Review – ‘बंदर’: बॉबी देओल ने अभिनय से जीता दिल, लेकिन बिखरा स्क्रीनप्ले फिल्म को नहीं संभाल पाया

बॉलीवुड में समय-समय पर ऐसी फिल्में आती हैं जो अपने विषय, प्रस्तुति और कलाकारों की वजह से चर्चा में रहती हैं। ‘बंदर’ भी ऐसी ही एक फिल्म है, जिसने अपने टीजर और ट्रेलर से दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता पैदा की थी। फिल्म में बॉबी देओल मुख्य भूमिका में हैं और लंबे समय बाद एक बार फिर उन्होंने अपने अभिनय से प्रभावित करने की कोशिश की है। हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बॉबी देओल की परफॉर्मेंस ही बनकर रह जाती है, क्योंकि कमजोर स्क्रीनप्ले, असंतुलित दृष्टिकोण और कहानी की ढीली पकड़ इसे एक यादगार फिल्म बनने से रोक देते हैं।

फिल्म की कहानी एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जो समाज, सत्ता और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच फंसा हुआ है। कहानी में कई गंभीर मुद्दों को छूने की कोशिश की गई है और निर्देशक ने इसे सामाजिक व्यंग्य तथा भावनात्मक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। शुरुआती हिस्से में फिल्म दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने में सफल रहती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसकी कमजोरियां सामने आने लगती हैं।

बॉबी देओल फिल्म की जान हैं। उन्होंने अपने किरदार में गहराई और गंभीरता लाने की पूरी कोशिश की है। कई दृश्यों में उनकी आंखें और हावभाव संवादों से ज्यादा प्रभाव छोड़ते हैं। पिछले कुछ वर्षों में बॉबी ने अपने अभिनय से दर्शकों को चौंकाया है और ‘बंदर’ में भी वह पूरी ईमानदारी के साथ अपने किरदार को निभाते नजर आते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि फिल्म में बॉबी देओल न होते, तो इसका प्रभाव और भी कमजोर हो सकता था।

फिल्म का सबसे बड़ा नकारात्मक पक्ष इसका स्क्रीनप्ले है। कहानी कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाती तो है, लेकिन उन्हें सही तरीके से विकसित नहीं कर पाती। कई घटनाएं अचानक घटती हैं और कई किरदारों को पर्याप्त समय नहीं मिलता। परिणामस्वरूप दर्शक कहानी से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते। ऐसा लगता है कि फिल्म के पास कहने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन उसे प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया।

निर्देशक ने फिल्म को एक सामाजिक टिप्पणी के रूप में पेश करने की कोशिश की है, लेकिन उसका नजरिया कई जगह असंतुलित महसूस होता है। कुछ मुद्दों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया है, जबकि कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को सतही रूप से दिखाया गया है। यही असंतुलन फिल्म के प्रभाव को कमजोर करता है और दर्शकों को भ्रमित भी करता है।

सहायक कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करने की कोशिश की है। कुछ कलाकारों का अभिनय प्रभावित करता है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उनके किरदार पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। कई बार ऐसा लगता है कि फिल्म के पास अच्छे कलाकार हैं, लेकिन उन्हें अपनी क्षमता दिखाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।

तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत नजर आती है। सिनेमैटोग्राफी कई दृश्यों में शानदार है और कैमरे का काम कहानी के गंभीर माहौल को उभारने में मदद करता है। कुछ दृश्य बेहद प्रभावशाली तरीके से फिल्माए गए हैं और उनमें सिनेमाई गुणवत्ता दिखाई देती है। बैकग्राउंड म्यूजिक भी कई जगह कहानी के भावनात्मक प्रभाव को बढ़ाता है।

फिल्म का पहला भाग अपेक्षाकृत बेहतर है, जहां कहानी धीरे-धीरे अपने किरदारों और परिस्थितियों को स्थापित करती है। लेकिन दूसरे हाफ में पटकथा बिखरने लगती है। कई दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे लगते हैं और कहानी अपनी दिशा खोती हुई नजर आती है। यही वजह है कि फिल्म का प्रभाव अंत तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ जाता है।

क्लाइमैक्स में फिल्म कुछ बड़े सवाल छोड़ने की कोशिश करती है, लेकिन उनका समाधान संतोषजनक नहीं लगता। दर्शकों को ऐसा महसूस होता है कि कहानी का निष्कर्ष और ज्यादा प्रभावशाली हो सकता था। कई महत्वपूर्ण मुद्दे अधूरे रह जाते हैं, जिससे फिल्म समाप्त होने के बाद भी अधूरेपन का एहसास बना रहता है।

‘बंदर’ उन फिल्मों में से है जिनमें संभावनाएं बहुत थीं। एक मजबूत विषय, अनुभवी अभिनेता और गंभीर प्रस्तुति के बावजूद फिल्म अपने उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाती। इसकी सबसे बड़ी वजह कमजोर लेखन और असंतुलित स्क्रीनप्ले है।

हालांकि यदि आप बॉबी देओल के प्रशंसक हैं, तो यह फिल्म उनके अभिनय के लिए देखी जा सकती है। उन्होंने अपने किरदार को जिस गंभीरता और समर्पण के साथ निभाया है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां उनका प्रदर्शन फिल्म को नई ऊर्जा देता है।

कुल मिलाकर, ‘बंदर’ एक ऐसी फिल्म है जो अपने विचारों और कलाकारों के दम पर बड़ी बन सकती थी, लेकिन कमजोर पटकथा और असंतुलित दृष्टिकोण के कारण औसत फिल्म बनकर रह जाती है। बॉबी देओल की दमदार परफॉर्मेंस इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अकेले अभिनय किसी फिल्म को सफल बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होता। यही कारण है कि ‘बंदर’ एक अच्छे प्रयास के बावजूद दर्शकों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाती

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