बॉलीवुड की रोमांटिक-कॉमेडी फिल्मों का अपना एक अलग दर्शक वर्ग है। जब किसी फिल्म में प्यार, दोस्ती, फैमिली ड्रामा और भरपूर कॉमेडी का मिश्रण हो तो दर्शकों की उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं। ऐसी ही उम्मीदों के साथ रिलीज हुई फिल्म ‘है जवानी तो इश्क होना है’ बड़े मनोरंजन का वादा करती है, लेकिन स्क्रीन पर आते-आते यह वादा पूरी तरह निभा नहीं पाती। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अभिनेता वरुण धवन की कॉमिक टाइमिंग और उनकी ऊर्जा है, जो कई मौकों पर फिल्म को संभालती नजर आती है। हालांकि कमजोर कहानी, जरूरत से ज्यादा लंबा रनटाइम और अनुमानित घटनाक्रम इसे एक औसत अनुभव बना देते हैं।
फिल्म की कहानी एक युवा लड़के की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो प्यार, करियर और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। कहानी की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में होती है और शुरुआती कुछ दृश्य दर्शकों को बांधे रखते हैं। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, इसकी गति धीमी पड़ने लगती है। कई ऐसे दृश्य हैं जिन्हें आसानी से छोटा किया जा सकता था, लेकिन उन्हें जरूरत से ज्यादा खींचा गया है।
वरुण धवन फिल्म के सबसे मजबूत पहलू बनकर उभरते हैं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, संवाद अदायगी और कॉमिक सीन में पकड़ शानदार है। कई जगह उनकी मौजूदगी ही दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखती है। वह अपने किरदार में पूरी तरह फिट नजर आते हैं और उनकी एनर्जी हर फ्रेम में दिखाई देती है। खासकर कॉमेडी वाले दृश्यों में उनका प्रदर्शन फिल्म को बेहतर बनाता है।
फिल्म की लीड अभिनेत्री ने भी अच्छा काम किया है और वरुण के साथ उनकी केमिस्ट्री कई दृश्यों में प्रभाव छोड़ती है। दोनों के बीच के रोमांटिक पल फिल्म के बेहतर हिस्सों में गिने जा सकते हैं। हालांकि पटकथा की कमजोरी के कारण उनके किरदारों को गहराई नहीं मिल पाती। यही वजह है कि दर्शक उनसे पूरी तरह भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते।
निर्देशक ने फिल्म को एक पारिवारिक मनोरंजन पैकेज बनाने की कोशिश की है। इसमें रोमांस, कॉमेडी, इमोशन और ड्रामा सब कुछ मौजूद है, लेकिन इनमें संतुलन की कमी साफ दिखाई देती है। फिल्म कई बार यह तय नहीं कर पाती कि उसे रोमांटिक कहानी बनना है, पारिवारिक ड्रामा बनना है या फिर पूरी तरह कॉमेडी पर फोकस करना है। यही असमंजस फिल्म को कमजोर करता है।
संगीत की बात करें तो फिल्म के कुछ गाने सुनने में अच्छे लगते हैं और कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। हालांकि ऐसा कोई गाना नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद लंबे समय तक याद रह जाए। बैकग्राउंड स्कोर कुछ दृश्यों में प्रभावी है, लेकिन कई जगह यह सामान्य महसूस होता है।
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी लंबाई है। लगभग हर दूसरे दृश्य में ऐसा लगता है कि कहानी को बिना किसी अतिरिक्त प्रभाव के खींचा जा रहा है। यदि संपादन थोड़ा और कसा हुआ होता, तो फिल्म ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी। दूसरे हाफ में यह समस्या और ज्यादा महसूस होती है, जहां कहानी बार-बार एक जैसे मोड़ लेती दिखाई देती है।
कॉमेडी की बात करें तो फिल्म में कुछ दृश्य वाकई हंसाने में सफल रहते हैं। वरुण धवन के कई वन-लाइनर्स और सिचुएशनल कॉमेडी वाले पल मनोरंजन करते हैं। लेकिन पूरी फिल्म में हास्य का स्तर एक जैसा नहीं रहता। कुछ मजाक जबरदस्ती डाले गए लगते हैं और उनका प्रभाव कमजोर पड़ जाता है।
तकनीकी रूप से फिल्म अच्छी दिखती है। सिनेमैटोग्राफी आकर्षक है और रंगीन लोकेशन्स स्क्रीन पर खूबसूरत नजर आती हैं। कॉस्ट्यूम और प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म के माहौल के अनुरूप हैं। लेकिन केवल तकनीकी मजबूती किसी फिल्म को यादगार नहीं बना सकती, इसके लिए मजबूत कहानी भी जरूरी होती है।
क्लाइमैक्स की बात करें तो यह पूरी तरह अनुमानित है। दर्शक पहले ही समझ जाते हैं कि कहानी किस दिशा में जा रही है। इसलिए फिल्म का अंत कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ता। हालांकि पारिवारिक दर्शकों को इसका हल्का-फुल्का अंदाज पसंद आ सकता है।
कुल मिलाकर, ‘है जवानी तो इश्क होना है’ एक ऐसी फिल्म है जो वरुण धवन की दमदार कॉमिक टाइमिंग और मनोरंजक व्यक्तित्व की वजह से देखने लायक बनती है। लेकिन कमजोर कहानी, लंबा रनटाइम और साधारण पटकथा इसे एक औसत रोमांटिक-कॉमेडी से आगे नहीं बढ़ने देते। अगर आप हल्का-फुल्का मनोरंजन और वरुण धवन के फैन हैं, तो यह फिल्म आपको कुछ हद तक पसंद आ सकती है। लेकिन यदि आप एक मजबूत कहानी और यादगार सिनेमाई अनुभव की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी।