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‘टॉक्सिक’ Review: यश का दमदार अंदाज और जबरदस्त एक्शन जीतता दिल, लेकिन कमजोर कहानी और लंबी अवधि करती है परेशान

यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरीटेल फॉर ग्रोन-अप्स’ आखिरकार सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है और फिल्म को लेकर दर्शकों में पहले से ही जबरदस्त उत्साह था। ‘केजीएफ’ फ्रेंचाइजी के बाद यश को एक नए अवतार में देखने की उम्मीद फैंस लंबे समय से कर रहे थे। फिल्म में स्टाइल, एक्शन, बड़े सेट और स्टार पावर की कोई कमी नहीं है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले बन जाती है। करीब तीन घंटे की लंबी अवधि के कारण कई जगह फिल्म जरूरत से ज्यादा खिंची हुई महसूस होती है। यानी पर्दे पर यश का स्वैग तो भरपूर है, लेकिन कहानी दर्शकों को लगातार बांधे रखने में कामयाब नहीं हो पाती।

फिल्म की शुरुआत से ही इसका विजुअल ट्रीटमेंट ध्यान खींचता है। यश की एंट्री को बड़े पैमाने पर फिल्माया गया है और उनके किरदार को बेहद स्टाइलिश अंदाज में पेश किया गया है। कैमरा वर्क, बैकग्राउंड म्यूजिक, एक्शन सीक्वेंस और सेट डिजाइन मिलकर फिल्म को एक खास सिनेमाई अनुभव देने की कोशिश करते हैं। यश का स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। वह जब पर्दे पर आते हैं तो उनका स्वैग और बॉडी लैंग्वेज दर्शकों का ध्यान खींच लेती है। कई सीन ऐसे हैं जहां कहानी से ज्यादा यश का स्टारडम ही फिल्म को आगे बढ़ाता नजर आता है।

फिल्म की दुनिया अपराध, सत्ता, ड्रग्स और हिंसा के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी में कई किरदार और उनके आपसी रिश्ते हैं, लेकिन समस्या यह है कि पटकथा इन सभी को एक साथ जोड़ने में कई बार उलझ जाती है। फिल्म लगातार एक घटना से दूसरी घटना की ओर बढ़ती है और दर्शक को यह समझने में समय लग जाता है कि असल संघर्ष क्या है। कई जगह कहानी को जानबूझकर रहस्यमय रखने की कोशिश की गई है, लेकिन रहस्य और भ्रम के बीच की लाइन धुंधली हो जाती है। यही वजह है कि फिल्म का पहला हिस्सा कुछ दर्शकों को आकर्षित करने के बावजूद आगे चलकर भारी लगने लगता है।

‘टॉक्सिक’ का एक्शन निश्चित रूप से इसकी खासियत है। फिल्म में बड़े पैमाने पर एक्शन सेट पीसेज तैयार किए गए हैं और यश को एक्शन हीरो के रूप में पूरी तरह इस्तेमाल किया गया है। गोलीबारी, हाथापाई, पीछा करने वाले दृश्य और बड़े स्टंट फिल्म को मास एंटरटेनमेंट का रंग देते हैं। हालांकि, समस्या तब आती है जब एक्शन की मात्रा कहानी पर हावी होने लगती है। कई दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ एक और बड़ा एक्शन सीन दिखाने पर ज्यादा जोर दिया गया है।

यश का अभिनय फिल्म की उम्मीदों पर काफी हद तक खरा उतरता है। वह अपने किरदार के एटीट्यूड और आक्रामकता को प्रभावी तरीके से पर्दे पर उतारते हैं। भावनात्मक दृश्यों में भी वह अपनी छाप छोड़ने की कोशिश करते हैं। हालांकि, किरदार की गहराई को लेकर स्क्रीनप्ले पूरी तरह उनका साथ नहीं दे पाता। दर्शक को उनके किरदार के अतीत, सोच और बदलाव को समझने के लिए पर्याप्त भावनात्मक आधार नहीं मिलता। ऐसे में किरदार प्रभावशाली दिखता जरूर है, लेकिन उससे जुड़ाव उतना मजबूत नहीं बन पाता।

फिल्म में महिला किरदारों की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण है। नयनतारा, कियारा आडवाणी, तारा सुतारिया और हुमा कुरैशी जैसे कलाकार फिल्म का हिस्सा हैं। इन कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों में अच्छा काम करने की कोशिश की है, लेकिन स्क्रीनप्ले के कारण सभी किरदारों को समान गहराई नहीं मिल पाती। कुछ किरदार कहानी के लिए जरूरी नजर आते हैं, जबकि कुछ जगह उनका इस्तेमाल सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने या दृश्य को प्रभावशाली बनाने के लिए किया गया लगता है।

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर इसकी ऊर्जा को बढ़ाता है। खासकर एक्शन दृश्यों में बैकग्राउंड म्यूजिक स्क्रीन पर चल रही घटनाओं को ज्यादा प्रभावशाली बनाता है। सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म के बड़े पैमाने को दर्शाते हैं। फिल्म स्पष्ट रूप से एक बड़े थिएटर एक्सपीरियंस के लिए बनाई गई है और बड़े पर्दे पर इसके विजुअल्स का असर छोटे स्क्रीन की तुलना में बेहतर महसूस हो सकता है।

लेकिन सबसे बड़ी समस्या फिल्म की लंबाई है। लगभग तीन घंटे की अवधि के दौरान कहानी कई जगह रुकती और फिर दोबारा शुरू होती महसूस होती है। अगर एडिटिंग थोड़ी ज्यादा चुस्त होती और गैरजरूरी दृश्यों को हटाया जाता, तो फिल्म का प्रभाव काफी बेहतर हो सकता था। कुछ दर्शकों को दूसरे हिस्से में लगातार एक्शन और जटिल कहानी के कारण थकान महसूस हो सकती है। यही वजह है कि फिल्म खत्म होने के बाद दर्शक के मन में पहला सवाल यह आ सकता है कि इसे थोड़ा छोटा क्यों नहीं किया गया।

कुल मिलाकर, ‘टॉक्सिक’ उन दर्शकों के लिए एक विजुअल ट्रीट हो सकती है जो यश की स्टार पावर, बड़े एक्शन और स्टाइलिश सिनेमा का आनंद लेना चाहते हैं। लेकिन अगर आप मजबूत कहानी, साफ स्क्रीनप्ले और संतुलित गति वाली फिल्म की उम्मीद लेकर सिनेमाघर पहुंचते हैं, तो आपको निराशा हो सकती है। यश का स्टारडम फिल्म को संभालता है, लेकिन कहानी की उलझन और लंबी अवधि मनोरंजन के अनुभव को कमजोर कर देती है। ‘टॉक्सिक’ में स्टाइल और एक्शन का ओवरडोज जरूर है, मगर कहानी उस स्तर की नहीं बन पाती जिसकी उम्मीद यश की वापसी से थी।

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