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ओटीटी रिव्यू: प्रीतम एंड पेड्रोराजकुमार हिरानी का OTT डेब्यू उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा; दमदार कास्ट भी कमज़ोर स्क्रीनप्ले को नहीं बचा पाई।

बॉलीवुड में जब भी निर्देशक राजकुमार हिरानी का नाम सामने आता है, दर्शकों को एक ऐसी फिल्म या कहानी की उम्मीद होती है जिसमें मनोरंजन के साथ भावनाएं, सामाजिक संदेश और मजबूत पटकथा का बेहतरीन संतुलन देखने को मिले। यही वजह है कि उनके ओटीटी डेब्यू ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ को लेकर भी काफी उत्साह था। शानदार स्टारकास्ट, अनोखा कॉन्सेप्ट और बड़े नामों से सजी यह वेब फिल्म रिलीज से पहले चर्चा का विषय बनी रही। लेकिन रिलीज के बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या यह प्रोजेक्ट हिरानी की अब तक की पहचान को आगे बढ़ा पाता है या फिर उम्मीदों के बोझ तले दब जाता है।

‘प्रीतम एंड पेड्रो’ की कहानी दो बिल्कुल अलग व्यक्तित्व वाले किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों की सोच, जीवनशैली और परिस्थितियां एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन हालात उन्हें एक ऐसे सफर पर ले जाते हैं जहां दोस्ती, संघर्ष, हास्य और भावनाओं का मिश्रण देखने को मिलता है। कहानी की शुरुआत काफी दिलचस्प है और शुरुआती एपिसोड दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखते हैं। किरदारों की एंट्री प्रभावशाली तरीके से होती है और ऐसा लगता है कि आगे कहानी कई बड़े मोड़ लेने वाली है। हालांकि जैसे-जैसे कथानक आगे बढ़ता है, स्क्रीनप्ले अपनी पकड़ खोने लगता है। कई दृश्य लंबे महसूस होते हैं और कहानी की गति बार-बार धीमी पड़ जाती है, जिससे रोमांच और भावनात्मक प्रभाव दोनों कमजोर पड़ जाते हैं।

अभिनय की बात करें तो पूरी स्टारकास्ट ने अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। मुख्य कलाकारों की केमिस्ट्री स्वाभाविक लगती है और दोनों के बीच होने वाले संवाद कई जगह मुस्कुराने का मौका देते हैं। भावनात्मक दृश्यों में भी कलाकारों ने ईमानदार अभिनय किया है। सहायक कलाकारों ने भी कहानी को मजबूती देने की कोशिश की है और कई छोटे किरदार अपनी छाप छोड़ने में सफल रहते हैं। यही वजह है कि अभिनय के स्तर पर यह प्रोजेक्ट निराश नहीं करता। कई बार ऐसा महसूस होता है कि यदि इन्हीं कलाकारों को और मजबूत पटकथा मिलती तो परिणाम कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकता था।

निर्देशन के स्तर पर राजकुमार हिरानी की पहचान कई दृश्यों में साफ दिखाई देती है। हल्का-फुल्का हास्य, भावनात्मक पल और रिश्तों की गर्माहट उनकी फिल्मों की खासियत रही है, जिसका असर यहां भी नजर आता है। हालांकि इस बार उनकी सबसे बड़ी ताकत यानी स्क्रीनप्ले उतनी मजबूत दिखाई नहीं देती। कहानी में कई ऐसे हिस्से हैं जहां घटनाएं दोहराई हुई लगती हैं और कुछ दृश्य केवल समय बढ़ाने के लिए जोड़े गए प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि दर्शकों का जुड़ाव बीच-बीच में कमजोर पड़ता है।

तकनीकी पक्ष की बात करें तो सीरीज काफी बेहतर नजर आती है। सिनेमैटोग्राफी आकर्षक है और लोकेशन्स कहानी के माहौल को खूबसूरती से पेश करती हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भावनात्मक दृश्यों में अच्छा असर छोड़ता है, जबकि हल्के-फुल्के पलों में संगीत कहानी के मूड के साथ तालमेल बनाए रखता है। एडिटिंग हालांकि थोड़ी और तेज हो सकती थी। कुछ एपिसोड या दृश्य छोटे किए जाते तो पूरी सीरीज ज्यादा प्रभावशाली और कसी हुई महसूस होती।

‘प्रीतम एंड पेड्रो’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है। दिलचस्प कॉन्सेप्ट होने के बावजूद कहानी में वह निरंतरता नहीं बन पाती जिसकी एक बेहतरीन ओटीटी ड्रामा से उम्मीद की जाती है। कई भावनात्मक मोड़ पर्याप्त असर नहीं छोड़ते और कुछ हास्य दृश्य भी अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं कर पाते। क्लाइमेक्स संतोषजनक जरूर है, लेकिन वह पूरी यात्रा को यादगार बनाने में सफल नहीं हो पाता। दर्शकों को ऐसा महसूस हो सकता है कि इतनी मजबूत स्टारकास्ट और अनुभवी निर्देशक के साथ इससे कहीं अधिक प्रभावशाली कहानी प्रस्तुत की जा सकती थी।

कुल मिलाकर ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ एक ऐसी ओटीटी प्रस्तुति है जिसमें बेहतरीन कलाकार, अच्छा निर्देशन और दिलचस्प विचार मौजूद हैं, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले इसकी सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। अगर आप हल्के-फुल्के ड्रामा, रिश्तों पर आधारित कहानियां और शानदार अभिनय देखना पसंद करते हैं तो यह सीरीज एक बार जरूर देख सकते हैं। हालांकि यदि आप राजकुमार हिरानी की पिछली फिल्मों जैसी दमदार पटकथा और गहरे भावनात्मक प्रभाव की उम्मीद लेकर बैठेंगे, तो यह सीरीज आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी। यह एक अच्छा प्रयास है, लेकिन उसे यादगार बनाने वाली कहानी की मजबूती यहां कहीं न कहीं कम पड़ जाती है।

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