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‘धुरंधर’ को ऑस्कर एंट्री न मिलने पर उठे सवाल, विवेक वासवानी ने बताया भारतीय संस्कृति और परंपरा की कमी क्यों बनी वजह

भारत की ओर से ऑस्कर के लिए किसी फिल्म का चयन हमेशा चर्चा का विषय रहता है। हर साल जब किसी फिल्म को आधिकारिक एंट्री के तौर पर चुना जाता है, तो दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री की नजर उस फैसले पर रहती है। इस बार ‘धुरंधर’ को ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री न बनाए जाने को लेकर बहस तेज हो गई है। फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच काफी चर्चा थी और कई लोगों को उम्मीद थी कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिल सकता है। लेकिन चयन न होने के बाद अब ज्यूरी से जुड़े सदस्य विवेक वासवानी के बयान ने इस बहस को और हवा दे दी है। उन्होंने फिल्म के चयन को लेकर अपनी राय रखते हुए कहा कि ऑस्कर के लिए चुनी जाने वाली फिल्म में भारतीय संस्कृति और परंपरा की झलक दिखाई देना महत्वपूर्ण हो सकता है। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर फिल्म के पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

‘धुरंधर’ को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी केवल इसकी कहानी या कलाकारों की वजह से नहीं रही, बल्कि फिल्म की प्रस्तुति और विषय को लेकर भी काफी चर्चा हुई। रिलीज से पहले ही फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच उत्सुकता बनी हुई थी। ऐसे में जब ऑस्कर की भारतीय एंट्री की बात सामने आई, तो फिल्म के प्रशंसकों को उम्मीद थी कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिल सकता है। लेकिन जब चयन किसी दूसरी फिल्म के पक्ष में गया, तो कई सवाल उठने लगे। कुछ दर्शकों ने ज्यूरी के फैसले पर सवाल उठाए, जबकि कुछ लोगों ने माना कि ऑस्कर के लिए फिल्म चुनना केवल लोकप्रियता या बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करता। किसी फिल्म की कहानी, विषय, सिनेमाई गुणवत्ता, सांस्कृतिक पहचान और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों पर संभावित प्रभाव जैसे कई पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।

विवेक वासवानी का बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके अनुसार भारतीय फिल्म के ऑस्कर प्रतिनिधित्व में देश की संस्कृति और परंपरा की झलक एक मजबूत पक्ष हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल धार्मिक या पारंपरिक विषय वाली फिल्म ही ऑस्कर के लिए योग्य हो सकती है। भारतीय सिनेमा में ऐसी कई फिल्में रही हैं, जिन्होंने बिना सीधे तौर पर पारंपरिक भारत दिखाए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। लेकिन जब किसी फिल्म को देश की ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना जाता है, तो उसमें भारतीय समाज, संस्कृति, भावनाओं या जीवन की कोई विशिष्ट पहचान अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए आकर्षण का कारण बन सकती है। यही पहलू ‘धुरंधर’ के चयन को लेकर चल रही बहस का हिस्सा बन गया है।

ऑस्कर के लिए किसी फिल्म का चयन एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा होता है। भारत में अलग-अलग फिल्मों पर विचार करने के बाद चयन समिति अपनी पसंद की फिल्म को आधिकारिक एंट्री के तौर पर आगे भेजती है। इस दौरान कई पहलुओं पर चर्चा की जाती है। केवल फिल्म की लोकप्रियता या बड़े सितारों की मौजूदगी से चयन तय नहीं होता। कहानी की मौलिकता, निर्देशन, अभिनय, तकनीकी पक्ष और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के साथ फिल्म के जुड़ने की क्षमता जैसे तत्व भी महत्वपूर्ण होते हैं। यही कारण है कि कई बार दर्शकों की पसंद और ज्यूरी के फैसले में अंतर दिखाई देता है। ‘धुरंधर’ के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है।

सोशल मीडिया ने इस बहस को और ज्यादा व्यापक बना दिया है। फिल्म के प्रशंसक अपने पसंदीदा प्रोजेक्ट के पक्ष में तर्क दे रहे हैं और कुछ लोग ज्यूरी के फैसले को सही बता रहे हैं। कुछ यूजर्स का कहना है कि किसी फिल्म की ऑस्कर क्षमता का मूल्यांकन उसके कंटेंट और सिनेमाई गुणवत्ता के आधार पर होना चाहिए, जबकि अन्य लोगों का मानना है कि भारत की आधिकारिक एंट्री में देश की सांस्कृतिक पहचान भी दिखाई देनी चाहिए। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि किसी फिल्म का ऑस्कर के लिए चयन न होना उसके खराब होने का प्रमाण नहीं है। इसी तरह चयनित फिल्म का चुना जाना भी इस बात की गारंटी नहीं देता कि उसे अंतिम ऑस्कर नामांकन मिल ही जाएगा।

‘धुरंधर’ को लेकर उठी यह बहस भारतीय सिनेमा के सामने मौजूद एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है। क्या अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए भारतीय फिल्मों को अपनी संस्कृति और परंपराओं को प्रमुखता से दिखाना चाहिए या फिर सार्वभौमिक मानवीय कहानियां ज्यादा प्रभावी हो सकती हैं? भारतीय सिनेमा के पास दोनों तरह की कहानियों की लंबी परंपरा है। एक ओर ऐसी फिल्में हैं जो भारतीय समाज और संस्कृति को केंद्र में रखती हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसी कहानियां भी हैं जो पूरी तरह सार्वभौमिक भावनाओं पर आधारित हैं और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों से जुड़ती हैं।

कुल मिलाकर, ‘धुरंधर’ का ऑस्कर की भारतीय एंट्री न बनना अब एक दिलचस्प बहस में बदल चुका है। विवेक वासवानी के बयान ने चयन प्रक्रिया, भारतीय संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की सिनेमाई पहचान को लेकर चर्चा को नई दिशा दी है। हालांकि अंतिम फैसला ज्यूरी के सामूहिक मूल्यांकन पर आधारित होता है और किसी एक बयान से पूरी चयन प्रक्रिया को समझना संभव नहीं है। ‘धुरंधर’ के प्रशंसक भले ही इस फैसले से निराश हों, लेकिन फिल्म को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी अभी भी कायम है। आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है कि आखिर भारत की फिल्मों को ऑस्कर जैसे वैश्विक मंच पर सफलता हासिल करने के लिए किन तत्वों की जरूरत होती है।

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