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‘द इंडिया स्टोरी’ Review: गंभीर विषय होने के बावजूद कमजोर पटकथा, फीका कोर्टरूम ड्रामा और बिखरा निर्देशन नहीं छोड़ पाता प्रभाव

फिल्मों की दुनिया में कई बार ऐसे विषय चुने जाते हैं जो सामाजिक, राजनीतिक या न्याय व्यवस्था से जुड़े बड़े सवाल उठाते हैं। ऐसे विषयों पर बनी फिल्मों से दर्शकों को हमेशा गहरी कहानी, दमदार संवाद और प्रभावशाली प्रस्तुति की उम्मीद रहती है। ‘द इंडिया स्टोरी’ भी एक ऐसे ही गंभीर मुद्दे को केंद्र में रखकर बनाई गई फिल्म है। हालांकि, जिस विषय में एक मजबूत और प्रभावशाली सिनेमाई अनुभव देने की क्षमता थी, वह कमजोर लेखन, धीमी गति और बेजान कोर्टरूम ड्रामा के कारण अपनी पकड़ खो बैठती है। फिल्म बड़े सवाल तो उठाती है, लेकिन उनके जवाब तलाशने की बजाय कई जगह सतही प्रस्तुति में उलझ जाती है।

फिल्म की कहानी एक ऐसे संवेदनशील मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो समाज और न्याय व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। शुरुआती दृश्य दर्शकों में उत्सुकता पैदा करते हैं और ऐसा लगता है कि आगे कहानी कई चौंकाने वाले मोड़ लेकर आएगी। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, कहानी की गति कमजोर पड़ने लगती है। पटकथा में वह कसाव नजर नहीं आता जिसकी एक कोर्टरूम ड्रामा से उम्मीद की जाती है। कई दृश्य केवल समय बढ़ाने के लिए जोड़े गए महसूस होते हैं, जिससे फिल्म की रफ्तार प्रभावित होती है।

कोर्टरूम ड्रामा किसी भी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत तब बनता है जब उसमें दमदार बहस, मजबूत तर्क और भावनात्मक टकराव देखने को मिले। लेकिन ‘द इंडिया स्टोरी’ में अदालत से जुड़े कई दृश्य उम्मीद के अनुरूप प्रभाव नहीं छोड़ते। संवादों में वह धार नहीं है जो दर्शकों को सीट से बांधे रख सके। कई महत्वपूर्ण बहसें जल्दबाजी में खत्म होती हैं, जबकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे खिंचते हैं। परिणामस्वरूप फिल्म का सबसे अहम हिस्सा भी औसत अनुभव बनकर रह जाता है।

अभिनय की बात करें तो मुख्य कलाकारों ने अपने किरदारों को ईमानदारी से निभाने की कोशिश की है। भावनात्मक दृश्यों में कुछ कलाकार प्रभाव छोड़ने में सफल रहते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा उनके प्रदर्शन को पूरी तरह उभरने का अवसर नहीं देती। कोर्टरूम में वकीलों और अन्य पात्रों के बीच संवादों में जिस तीखेपन और ऊर्जा की जरूरत थी, उसकी कमी साफ महसूस होती है। सहायक कलाकारों का प्रदर्शन संतोषजनक है, लेकिन उन्हें भी सीमित दायरे में ही काम करने का मौका मिलता है।

तकनीकी दृष्टि से फिल्म औसत कही जा सकती है। सिनेमैटोग्राफी कुछ दृश्यों में अच्छी लगती है और अदालत के वातावरण को वास्तविक बनाने की कोशिश दिखाई देती है। बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के गंभीर माहौल को बनाए रखने का प्रयास करता है, लेकिन कई जगह यह भावनात्मक प्रभाव बढ़ाने में सफल नहीं हो पाता। संपादन भी फिल्म की कमजोरी बनकर सामने आता है। यदि कहानी को अधिक सटीक और संक्षिप्त तरीके से प्रस्तुत किया जाता, तो फिल्म कहीं अधिक प्रभावशाली बन सकती थी।

निर्देशक की मंशा एक बड़े सामाजिक मुद्दे को दर्शकों तक पहुंचाने की रही है, लेकिन प्रस्तुति उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती जिसकी अपेक्षा थी। कई बार ऐसा महसूस होता है कि फिल्म संदेश देने में इतनी व्यस्त हो जाती है कि मनोरंजन और कहानी कहने का संतुलन खो देती है। एक प्रभावशाली कोर्टरूम ड्रामा के लिए जरूरी रोमांच, तनाव और भावनात्मक गहराई पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती। यही कारण है कि फिल्म का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जाता है।

फिल्म का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि यह एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने की कोशिश करती है। ऐसे मुद्दों पर फिल्में बनना जरूरी है क्योंकि वे समाज में संवाद को बढ़ावा देती हैं। लेकिन केवल बड़ा विषय चुन लेना ही किसी फिल्म की सफलता की गारंटी नहीं होता। दर्शकों तक संदेश प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए मजबूत कहानी, संतुलित निर्देशन और प्रभावशाली पटकथा भी उतनी ही आवश्यक होती है। यही पहलू इस फिल्म में कमजोर नजर आते हैं।

कुल मिलाकर, ‘द इंडिया स्टोरी’ एक गंभीर और महत्वपूर्ण विषय पर आधारित फिल्म है, लेकिन इसकी कमजोर पटकथा, फीका कोर्टरूम ड्रामा और धीमी रफ्तार इसे यादगार बनने से रोक देते हैं। कलाकारों का ईमानदार प्रयास और विषय की गंभीरता कुछ हद तक फिल्म को संभालते हैं, लेकिन वे इसकी कमियों को पूरी तरह ढक नहीं पाते। यदि आप सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्मों में रुचि रखते हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। हालांकि दमदार कोर्टरूम ड्रामा और कसावदार कहानी की उम्मीद करने वाले दर्शकों को यह फिल्म पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी।

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