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Cocktail 2 Review – शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना की ‘कॉकटेल 2’ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, दर्शकों को किया निराश

बॉलीवुड में जब भी किसी सफल फिल्म का सीक्वल बनाया जाता है, तो दर्शकों की उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं। सालों पहले आई ‘कॉकटेल’ ने अपनी दिलचस्प कहानी, दमदार संगीत और शानदार किरदारों के दम पर युवाओं के दिलों में खास जगह बनाई थी। ऐसे में जब ‘कॉकटेल 2’ की घोषणा हुई और इसमें शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना जैसे लोकप्रिय सितारों को शामिल किया गया, तो फैंस को लगा कि उन्हें एक और यादगार रोमांटिक ड्रामा देखने को मिलेगा। लेकिन फिल्म रिलीज होने के बाद दर्शकों और समीक्षकों की प्रतिक्रियाएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी मानी जा रही है। जहां पहली ‘कॉकटेल’ में रिश्तों की जटिलताओं और भावनाओं को बेहद प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया था, वहीं ‘कॉकटेल 2’ की कहानी शुरुआत से ही बिखरी हुई नजर आती है। फिल्म का कथानक प्रेम त्रिकोण के इर्द-गिर्द घूमता है, लेकिन इसमें नया या रोमांचक कुछ भी महसूस नहीं होता। कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें सिर्फ स्क्रीन टाइम बढ़ाने के लिए जोड़ा गया हो। कहानी में न तो कोई मजबूत मोड़ है और न ही ऐसा भावनात्मक जुड़ाव, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रख सके।

शाहिद कपूर हमेशा से अपनी अभिनय क्षमता के लिए सराहे जाते रहे हैं और इस फिल्म में भी उन्होंने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश की है। हालांकि कमजोर पटकथा उनके प्रदर्शन को पूरी तरह उभरने नहीं देती। कई जगह शाहिद का किरदार भ्रमित नजर आता है और दर्शकों को यह समझने में कठिनाई होती है कि वह वास्तव में क्या चाहता है। दूसरी ओर कृति सेनन अपने ग्लैमरस अंदाज और स्क्रीन प्रेजेंस से प्रभावित करती हैं, लेकिन उनके किरदार को भी पर्याप्त गहराई नहीं दी गई है। रश्मिका मंदाना की मौजूदगी ताजगी जरूर लाती है, लेकिन उनका किरदार भी अधूरा सा महसूस होता है।

फिल्म का निर्देशन भी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। निर्देशक ने कहानी को आधुनिक रिश्तों के नजरिए से पेश करने की कोशिश की है, लेकिन निष्पादन कमजोर साबित होता है। कई दृश्य लंबे और खींचे हुए लगते हैं, जिससे फिल्म की गति प्रभावित होती है। लगभग ढाई घंटे की अवधि के दौरान कई बार ऐसा महसूस होता है कि कहानी आगे बढ़ने के बजाय एक ही जगह घूम रही है। यही कारण है कि दर्शकों का धैर्य बीच-बीच में टूटता नजर आता है।

संगीत की बात करें तो ‘कॉकटेल’ फ्रेंचाइजी की पहचान हमेशा उसके यादगार गानों से रही है। हालांकि ‘कॉकटेल 2’ का म्यूजिक उतना प्रभावशाली नहीं बन पाया। कुछ गाने सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन उनमें वह जादू नहीं है जो लंबे समय तक याद रह सके। बैकग्राउंड स्कोर भी कई मौकों पर भावनात्मक दृश्यों को मजबूत बनाने में असफल रहता है। यही वजह है कि फिल्म का भावनात्मक प्रभाव कमजोर पड़ जाता है।

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और लोकेशन्स इसकी सकारात्मक बातों में शामिल हैं। खूबसूरत विदेशी लोकेशन्स, शानदार विजुअल्स और आकर्षक फ्रेम्स दर्शकों को प्रभावित करते हैं। कैमरा वर्क कई दृश्यों को भव्यता प्रदान करता है और फिल्म देखने में आकर्षक लगती है। लेकिन सिर्फ सुंदर लोकेशन्स और ग्लैमरस प्रस्तुति किसी फिल्म को सफल नहीं बना सकती। जब कहानी और किरदार मजबूत न हों, तो तकनीकी खूबसूरती भी सीमित असर छोड़ती है।

‘कॉकटेल 2’ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में विफल रहती है। फिल्म में प्रेम, दोस्ती और रिश्तों के संघर्ष को दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन प्रस्तुति इतनी साधारण है कि दर्शक किरदारों की यात्रा से खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर पाते। कई संवाद भी सामान्य और अनुमानित लगते हैं, जिससे कहानी का प्रभाव और कम हो जाता है।

कुल मिलाकर, ‘कॉकटेल 2’ एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आती है जिसमें बड़े सितारे, शानदार लोकेशन्स और आकर्षक प्रस्तुति तो है, लेकिन मजबूत कहानी और भावनात्मक गहराई का अभाव साफ दिखाई देता है। शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना जैसे प्रतिभाशाली कलाकार अपनी पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन और धीमी गति फिल्म को बचा नहीं पाते। अगर आप एक हल्की-फुल्की रोमांटिक फिल्म देखना चाहते हैं तो यह एक बार देखी जा सकती है, लेकिन यदि आप पहली ‘कॉकटेल’ जैसी ताजगी और यादगार अनुभव की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है।

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