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पंचायत सीजन-4 रिव्यू: सचिव से लेकर प्रधान जी तक, किसी को नहीं बख्शा!

अमेज़न प्राइम की सुपरहिट वेब सीरीज़ ‘पंचायत’ का चौथा सीजन आखिरकार रिलीज़ हो गया है, और एक बार फिर यह सीज़न दर्शकों की उम्मीदों पर पूरी तरह खरा उतरता है। जितेंद्र कुमार उर्फ अभिषेक त्रिपाठी, रघुवीर यादव, नीना गुप्ता और बाकी कलाकारों ने इस बार भी अपने अभिनय से दिल जीत लिया है।

लेकिन खास बात ये है कि इस बार कहानी और भी ज्यादा पॉलिटिकली सैचुरेटेड, इमोशनल और कटाक्ष से भरपूर है। पंचायत 4 में सचिव जी से लेकर प्रधान जी तक, किसी को नहीं छोड़ा गया है – सभी किरदारों की कमज़ोरियों, ताकत और असलियत को बेबाकी से सामने रखा गया है।


कहानी में इस बार क्या है खास?

सीजन 4 की शुरुआत होती है पिछले सीज़न की राजनीति से भरे अंत से। सचिव जी अब और ज़िम्मेदार, समझदार और अंदरूनी राजनीति से जूझते नजर आते हैं। फुलेरा गांव की राजनीति, विकास योजनाएं और जनता की उम्मीदें – सब कुछ इस बार ज्यादा रियल और कटाक्ष से भरपूर दिखाया गया है।

प्रधान जी (रघुवीर यादव) की दुविधाएं, मालती देवी (नीना गुप्ता) की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता, और विकास-दुबे की कॉमेडी टाइमिंग – हर कैरेक्टर को इस बार गहराई से एक्सप्लोर किया गया है।


अभिनय और डायरेक्शन

जितेंद्र कुमार एक बार फिर सचिव जी के रोल में पूरी तरह फिट हैं। उन्होंने अपनी सादगी, संयम और इमोशनल रेंज से सीजन को जीवंत बना दिया है। उनकी आँखों में कई बार वो बेचैनी साफ नजर आती है जो सिस्टम से लड़ने के लिए जरूरी होती है।

नीना गुप्ता और रघुवीर यादव की कैमिस्ट्री और सहज अभिनय भी कहानी को मजबूती देता है। वहीं चंदन रॉय (विकास) और फैसल मलिक (प्रह्लाद) का ह्यूमर और दर्द दोनों देखने लायक है। खासकर प्रह्लाद की बैकस्टोरी और उनका अकेलापन इस बार दिल को छू जाता है।

डायरेक्टर दीपक कुमार मिश्रा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि छोटे गांवों की बड़ी कहानियां कैसे प्रभावशाली ढंग से कही जाती हैं। हर एपिसोड का अंत ऐसा है कि आप “बस एक और एपिसोड” कहकर सीरीज़ पूरी कर डालेंगे।


पंच और पोलिटिक्स की परतें

पंचायत 4 की सबसे बड़ी खूबी इसकी स्क्रिप्ट है, जो बहुत ही स्मार्ट तरीके से भारतीय ग्रामीण राजनीति की पोल खोलती है। भ्रष्टाचार, जातिवाद, अफसरशाही, और सत्ता की चालें – इन सब को दिखाते हुए सीरीज कभी उपदेशात्मक नहीं होती।

हर पंचलाइन में कटाक्ष है, और हर सीन में गहराई। जैसे प्रधान जी का एक डायलॉग – “कागज़ पे विकास हो रहा है, जमीन पे लोग अभी भी पाइप जोड़ रहे हैं।” – यह एक लाइन ही आज के सिस्टम की पोल खोल देती है।


कमजोरियां भी हैं?

अगर कमी की बात करें तो कुछ दर्शकों को यह सीज़न थोड़ा धीमा लग सकता है, क्योंकि इसमें एक्शन या ट्विस्ट कम हैं और कहानी बहुत रियलिस्टिक गति से आगे बढ़ती है। लेकिन यह धीमापन ही इस शो की आत्मा है – जो आपको सोचने पर मजबूर करता है।


निष्कर्ष

‘पंचायत सीजन 4’ केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि गांव की उस असली तस्वीर को दिखाता है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। यह सीरीज अपने किरदारों, संवादों और सादगी के साथ आपको हंसाती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है।

यह एक बार फिर साबित करता है कि ‘कंटेंट ही किंग है’ और अच्छे लेखन व अभिनय से वेब सीरीज़ भी सिनेमा के स्तर को छू सकती है।



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