तेलुगु सुपरस्टार और नेता नंदमुरी बालकृष्ण ने हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री में तेजी से बढ़ते टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। वे मानते हैं कि आजकल फिल्मों का असली सार, मेहनत और कलाकारों की जमीनी मेहनत तकनीकी शॉर्टकट्स में कहीं खो गई है। खासकर ग्रीन मैट और वीएफएक्स पर बढ़ती निर्भरता ने एक अलग ही चर्चाओं को जन्म दिया है। बालकृष्ण का यह बयान सोशल मीडिया से लेकर फिल्म इंडस्ट्री तक चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।
उनका कहना है कि आज के समय में कई स्टार्स सेट पर आने के बजाय ग्रीन मैट के सामने अपनी शूटिंग पूरी कर लेते हैं। इससे न सिर्फ रियल लोकेशन की खूबसूरती खत्म हो रही है बल्कि कलाकारों की असली एक्टिंग के स्तर पर भी असर पड़ रहा है। बालकृष्ण का मानना है कि फिल्में भावनाओं, वास्तविकता और अदाकारी के गहरे मेल से बनती हैं, लेकिन जब सब कुछ कंप्यूटर स्क्रीन पर तैयार होने लगे, तो कहानी की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।
• तकनीक अच्छी है, लेकिन हद से ज़्यादा निर्भरता नुकसानदेह
उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह टेक्नोलॉजी के खिलाफ नहीं हैं। बल्कि उनका मानना है कि टेक्नोलॉजी ने फिल्मों को भव्यता दी है, बड़े पैमाने पर शूटिंग को आसान बनाया है और कई शानदार दृश्य संभव किए हैं। लेकिन जब फिल्म पूरी तरह तकनीक पर निर्भर हो जाए और शूटिंग स्टूडियो की चार दीवारों के भीतर ग्रीन मैट के सामने ही निपटा ली जाए, तब समस्या पैदा होती है।
बालकृष्ण ने उदाहरण देते हुए बताया कि पुराने जमाने में कलाकार सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर शूट करते थे, पहाड़ों, जंगलों और गाँवों की असली खूबसूरती को कैमरे में कैद किया जाता था। लेकिन आज कई बड़े प्रोजेक्ट्स रियल लोकेशन की जगह कंप्यूटर-जनित ग्राफिक्स से बनाए जा रहे हैं। इससे असलीपन खत्म होता जा रहा है।
• दर्शक महसूस करते हैं फर्क—दिल को छूने वाले दृश्य तकनीक में खो जाते हैं
बालकृष्ण ने कहा कि दर्शक आज भी असली लोकेशन और वास्तविक अभिनय को ज्यादा पसंद करते हैं। वे समझते हैं कि कौन-सा सीन रियल है और कौन-सा पूरी तरह CGI। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तभी बेहतर है जब वह कहानी को मजबूत करे, न कि उसे नकली बना दे।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब कलाकार वास्तविक परिस्थितियों में शूट करते हैं—धूप, मिट्टी, बारिश, हवा—तो उनकी एक्टिंग और भावनाएं भी अधिक वास्तविक लगती हैं। ऐसे में दर्शकों तक वही भावनाएं पहुंचती हैं, जिससे फिल्म यादगार बनती है।
• “आजकल के हीरो को मेहनत करनी चाहिए, सिर्फ स्क्रीन पर दिखने से स्टारडम नहीं मिलता”
उन्होंने आज के युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि असली स्टारडम सिर्फ सोशल मीडिया फॉलोअर्स या हाई-विजुअल फिल्में देकर नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि एक्ट्रर्स को सेट पर समय देना चाहिए, टीमवर्क सीखना चाहिए और दर्शकों के लिए मेहनत करनी चाहिए।
बालकृष्ण ने कहा—
“हीरो बनना आसान नहीं है। सिर्फ ग्रीन मैट के सामने खड़े होकर शूट करना एक कलाकार की असली पहचान नहीं है। जब तक आप खुद को चुनौती नहीं देंगे, तब तक दर्शक आपको असली स्टार के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे।”
• इंडस्ट्री को संतुलन सीखने की जरूरत
उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से भी अपील की कि टेक्नोलॉजी और रियल शूटिंग के बीच संतुलन बनाया जाए। बड़े सेट्स, असली लोकेशन, रियल स्टंट्स और लाइव एक्टिंग जैसी चीजें हमेशा फिल्मों का आधार रहेंगी। टेक्नोलॉजी को सिर्फ सपोर्ट के रूप में इस्तेमाल होना चाहिए, न कि कहानी की नींव के तौर पर।
बालकृष्ण के बयान ने युवा निर्देशकों और फिल्ममेकर्स के बीच भी बहस छेड़ दी है। कई लोगों ने उनकी बात का समर्थन किया है, वहीं कुछ मानते हैं कि आज के समय में टेक्नोलॉजी जरूरी है। लेकिन इस बात से सभी सहमत हैं कि संतुलन सबसे ज्यादा जरूरी है।