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“‘उदयपुर फाइल्स’ पर बैन की मांग के बीच दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कुछ खास समूहों के लिए होगी स्क्रीनिंग”

पिछले कुछ समय से चर्चा और विवादों में बनी फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ (Udaipur Files) को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है।
इस फिल्म को लेकर जहां एक ओर कुछ संगठनों ने बैन लगाने की मांग की है, वहीं अब दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर एक मध्यमार्गी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने फिल्म पर तत्काल कोई रोक नहीं लगाई, लेकिन इसकी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए कुछ सीमित वर्गों के लिए स्क्रीनिंग की अनुमति दी है।


❖ फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ क्या है?

‘उदयपुर फाइल्स’ एक डॉक्यू-ड्रामा शैली की फिल्म है, जो 2022 में राजस्थान के उदयपुर में कन्हैया लाल की निर्मम हत्या की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
फिल्म का उद्देश्य बताया गया है — “कट्टरपंथ के खिलाफ जागरूकता फैलाना और समाज में शांति की अपील करना।”

लेकिन फिल्म के कुछ दृश्यों और कथावस्तु को लेकर कई धार्मिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध जताया है।
उनका कहना है कि फिल्म धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकती है और सामाजिक वैमनस्य बढ़ा सकती है।


❖ कोर्ट में क्या हुआ?

दिल्ली हाईकोर्ट में फिल्म के खिलाफ एक याचिका दायर की गई, जिसमें मांग की गई कि:

  • फिल्म को पूर्ण रूप से बैन किया जाए
  • या इसे रिलीज़ से पहले केंद्र सरकार और सेंसर बोर्ड से दोबारा मंजूरी दिलवाई जाए

इस पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने स्पष्ट किया कि:

“फिल्म संवेदनशील है और इसमें कुछ दृश्य समाज को बांटने वाले हो सकते हैं, लेकिन पूरी तरह से बैन करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होगा।”


❖ कोर्ट का फैसला: सीमित स्क्रीनिंग की अनुमति

कोर्ट ने फिल्म को लेकर निम्न निर्देश दिए:

  1. फिल्म का पब्लिक थियेटर रिलीज फिलहाल नहीं किया जाएगा।
  2. इसकी स्क्रीनिंग कुछ सीमित और नियंत्रित समूहों के लिए की जा सकती है — जैसे:
    • कानूनी विशेषज्ञ
    • सेंसर बोर्ड प्रतिनिधि
    • मानवाधिकार संगठन
    • मीडिया विश्लेषक
  3. इन स्क्रीनिंग का उद्देश्य होगा फिल्म के कंटेंट का समीक्षा और मूल्यांकन करना, न कि प्रचार।

❖ याचिकाकर्ताओं की दलील

फिल्म के विरोध में खड़े याचिकाकर्ताओं ने कहा कि:

  • “इस फिल्म में ऐसे विजुअल्स और संवाद हैं जो धार्मिक समुदाय विशेष के प्रति घृणा फैला सकते हैं।”
  • “यह देश की **सांप्रदायिक एकता को चोट पहुंचा सकती है।”
  • “ऐसी फिल्में ‘The Kashmir Files’ की तरह सामाजिक ध्रुवीकरण का कारण बनती हैं।”

❖ फिल्म निर्माताओं का पक्ष

निर्देशक और निर्माता का दावा है कि:

  • “यह फिल्म केवल सच्चाई पर आधारित है, कोई झूठ नहीं दिखाया गया।”
  • “हमारे पास हर दावे के लिए डॉक्युमेंट्री सबूत हैं।”
  • “हमारा उद्देश्य किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि आतंकी मानसिकता के खिलाफ है।”

फिल्म के निर्माताओं ने कोर्ट से पूर्ण स्वतंत्र रिलीज की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सशर्त अनुमति दी।

❖ निष्कर्ष

‘उदयपुर फाइल्स’ को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका समाज के संवेदनशील विषयों पर संतुलन बनाए रखने के पक्ष में है।
जहां एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व दिया गया, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सौहार्द को नुकसान न पहुंचे, इसका भी पूरा ध्यान रखा गया है।

अब फिल्म का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि स्क्रीनिंग के बाद विशेषज्ञ क्या राय रखते हैं, और क्या फिल्म को संपादित कर या अतिरिक्त प्रमाण के साथ थियेटर में लाया जा सकता है।

जो भी हो, ‘उदयपुर फाइल्स’ केवल एक फिल्म नहीं, भारत के समकालीन सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है।

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