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Movie Review – ‘मिर्जापुर: द फिल्म’ में कालीन भैया का ठहराव, गुड्डू का गुस्सा और मुन्ना की सनक फिर लौटाती है पुरानी दुनिया

मिर्जापुर: द फिल्म’ उन फिल्मों में शामिल है, जिनसे दर्शकों की उम्मीदें सिर्फ कहानी की वजह से नहीं, बल्कि एक पूरी दुनिया से जुड़ी होती हैं। ओटीटी की चर्चित सीरीज ‘मिर्जापुर’ ने अपने किरदारों, हिंसा, राजनीति, बदले और काले हास्य के दम पर अलग पहचान बनाई थी। फिल्म उसी लोकप्रिय दुनिया को बड़े पर्दे पर आगे बढ़ाने की कोशिश करती है। यहां पुराने चेहरे, पुराने रिश्ते और वही बंदूकें दिखाई देती हैं, लेकिन फिल्म का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बड़े पर्दे का विस्तार कहानी को भी उतना ही मजबूत बना पाता है?

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार हैं। कालीन भैया का किरदार हमेशा से अपनी खामोशी और ठहराव के कारण खास रहा है। पंकज त्रिपाठी एक बार फिर इस भूमिका में अपने अंदाज से असर छोड़ते हैं। उनके चेहरे के भाव और कम शब्दों में ज्यादा कहने की शैली किरदार को वजन देती है। कालीन भैया का गुस्सा शोर नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे सामने आता है। यही ठहराव फिल्म के कई हिस्सों में दर्शकों को बांधे रखता है।

दूसरी तरफ गुड्डू पंडित का गुस्सा बिल्कुल अलग रंग दिखाता है। अली फजल अपने किरदार में आक्रामक ऊर्जा लेकर लौटते हैं। गुड्डू के लिए सत्ता सिर्फ कुर्सी नहीं बल्कि पुराने हिसाब चुकाने का रास्ता भी है। उसकी बेचैनी, बदले की भावना और लगातार बढ़ता गुस्सा फिल्म के एक्शन हिस्सों को गति देते हैं। अली फजल के अभिनय में वह रॉ एनर्जी दिखाई देती है, जिसके लिए गुड्डू का किरदार जाना जाता है।

फिल्म का एक और बड़ा आकर्षण मुन्ना त्रिपाठी की मौजूदगी है। दिव्येंदु का मुन्ना पहले भी दर्शकों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय रहा है। उसकी सनक, बेफिक्री और हिंसक अंदाज ‘मिर्जापुर’ की पहचान बन चुके हैं। फिल्म में मुन्ना का पागलपन कहानी में एक अलग तरह की ऊर्जा पैदा करता है। उसके संवाद और अचानक बदलते तेवर कई जगह मनोरंजन करते हैं। हालांकि, मुन्ना को लेकर दर्शकों की भावनाएं पहले से बहुत मजबूत हैं, इसलिए फिल्म में उसकी मौजूदगी को लेकर अपेक्षाएं भी काफी बड़ी रहती हैं।

‘मिर्जापुर: द फिल्म’ का एक्शन निश्चित तौर पर इसके प्रमुख आकर्षणों में है। बंदूकें गरजती हैं, गोलियां चलती हैं और हिंसा का स्तर कम नहीं होता। बड़े पर्दे पर इस दुनिया को देखने का अनुभव सीरीज की तुलना में ज्यादा भव्य महसूस हो सकता है। बैकग्राउंड स्कोर और सिनेमैटिक ट्रीटमेंट कई दृश्यों को प्रभावशाली बनाते हैं। खासकर वे सीन, जहां पुराने किरदार आमने-सामने आते हैं, दर्शकों में उत्सुकता पैदा करते हैं।

लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी यहीं से सामने आती है। कहानी कई जगह जरूरत से ज्यादा लंबी महसूस होती है। जिस सस्पेंस और तनाव को कम समय में प्रभावी तरीके से बनाया जा सकता था, उसे कई दृश्यों में खींच दिया गया है। कुछ घटनाएं कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ माहौल बनाने का काम करती हैं। यही वजह है कि फिल्म का पेसिंग हर हिस्से में समान नहीं रहता।

‘मिर्जापुर’ की दुनिया में राजनीति, परिवार, बदला और अपराध हमेशा एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। फिल्म भी इन्हीं तत्वों को आगे बढ़ाती है, लेकिन कई जगह ऐसा लगता है कि मेकर्स दर्शकों की पुरानी यादों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। जो दर्शक सीरीज के किरदारों और घटनाओं से अच्छी तरह परिचित हैं, उनके लिए फिल्म ज्यादा कनेक्टिंग हो सकती है। नए दर्शकों के लिए हालांकि कई रिश्ते और संदर्भ थोड़े भारी पड़ सकते हैं।

अभिनय की बात करें तो पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिव्येंदु फिल्म के मजबूत स्तंभ बने रहते हैं। तीनों कलाकार अपने-अपने किरदारों की पुरानी पहचान को बरकरार रखते हैं और बड़े पर्दे पर उन्हें और ज्यादा प्रभावशाली बनाने की कोशिश करते हैं। सहायक कलाकार भी कहानी को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं, लेकिन फिल्म का केंद्र लगातार उन्हीं लोकप्रिय चेहरों के आसपास घूमता रहता है।

कुल मिलाकर ‘मिर्जापुर: द फिल्म’ उन दर्शकों के लिए ज्यादा खास हो सकती है, जिन्होंने सीरीज की पूरी दुनिया को करीब से फॉलो किया है। मुन्ना का पागलपन, कालीन भैया का ठहराव, गुड्डू का गुस्सा और बंदूकों की आवाज इस फ्रेंचाइजी की पहचान को बरकरार रखते हैं। समस्या सिर्फ यह है कि फिल्म कई जगह अपनी कहानी को जरूरत से ज्यादा लंबा कर देती है। अगर आप ‘मिर्जापुर’ के फैन हैं, तो इसमें आपको अपने पसंदीदा किरदारों की वही पुरानी झलक जरूर मिलेगी; लेकिन अगर आप तेज और कसी हुई कहानी की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो लंबाई आपको थोड़ी परेशान कर सकती है।

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