बॉलीवुड में डार्क कॉमेडी एक ऐसा जॉनर है जो सही संतुलन के साथ पेश किया जाए तो दर्शकों को हंसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर कर सकता है। लेकिन जब यही संतुलन बिगड़ जाता है तो फिल्म मनोरंजन की जगह उलझन पैदा करने लगती है। नई रिलीज फिल्म ‘मां बहन’ कुछ ऐसी ही फिल्म साबित होती है। फिल्म में माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियां मौजूद हैं, लेकिन मजबूत कलाकारों के बावजूद यह फिल्म अपनी कमजोर कहानी और बिखरे हुए ट्रीटमेंट के कारण दर्शकों पर अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है।
फिल्म की कहानी एक ऐसे परिवार और उसके आसपास घटने वाली घटनाओं पर आधारित है, जहां रिश्तों, महत्वाकांक्षाओं, गलतफहमियों और सामाजिक व्यंग्य को डार्क कॉमेडी के अंदाज में पेश करने की कोशिश की गई है। शुरुआत में फिल्म कुछ दिलचस्प सवाल खड़े करती है और दर्शकों को यह उम्मीद देती है कि आगे चलकर कहानी रोचक मोड़ लेगी। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, उसकी पटकथा बिखरती चली जाती है और कई महत्वपूर्ण घटनाएं बिना प्रभाव छोड़े गुजर जाती हैं।
निर्देशक ने फिल्म में हास्य और गंभीरता का मिश्रण बनाने की कोशिश की है, लेकिन दोनों के बीच संतुलन कायम नहीं रह पाता। कई दृश्य ऐसे हैं जहां दर्शकों को हंसी आनी चाहिए थी, लेकिन वे असहज महसूस करते हैं। वहीं कुछ भावनात्मक क्षण इतने जल्दबाजी में आते हैं कि उनका प्रभाव पूरी तरह खत्म हो जाता है। परिणामस्वरूप फिल्म न तो पूरी तरह कॉमेडी बन पाती है और न ही प्रभावशाली सामाजिक व्यंग्य।
माधुरी दीक्षित फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक हैं। अनुभवी अभिनेत्री ने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी के साथ निभाने की कोशिश की है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस आज भी प्रभावशाली है और कई दृश्यों में वह फिल्म को संभालती नजर आती हैं। हालांकि कमजोर लेखन के कारण उनके अभिनय की क्षमता पूरी तरह सामने नहीं आ पाती। कई जगह ऐसा महसूस होता है कि उनका किरदार और बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता था।
तृप्ति डिमरी भी अपने रोल में प्रभाव छोड़ने की कोशिश करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया है और इस फिल्म में भी वह ईमानदार प्रदर्शन देती हैं। लेकिन कहानी की कमजोर पकड़ और किरदारों की अधूरी परतें उनके प्रदर्शन को सीमित कर देती हैं। उनके और माधुरी दीक्षित के बीच के कुछ दृश्य फिल्म के बेहतर हिस्सों में गिने जा सकते हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी पटकथा है। कहानी कई दिशाओं में जाने की कोशिश करती है लेकिन किसी एक विचार को मजबूती से पकड़ नहीं पाती। कई उपकथाएं शुरू होती हैं लेकिन उनका संतोषजनक निष्कर्ष नहीं मिलता। यही कारण है कि दर्शक फिल्म से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते।
डार्क कॉमेडी की सफलता काफी हद तक उसके संवादों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। दुर्भाग्य से ‘मां बहन’ इस मोर्चे पर भी कमजोर साबित होती है। कुछ संवाद जरूर मुस्कुराने का मौका देते हैं, लेकिन अधिकांश हास्य जबरदस्ती का महसूस होता है। कई बार फिल्म का व्यंग्य इतना बिखरा हुआ लगता है कि उसका उद्देश्य समझना मुश्किल हो जाता है।
तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म की सिनेमैटोग्राफी औसत से बेहतर है। कुछ दृश्य आकर्षक तरीके से फिल्माए गए हैं और विजुअल्स कहानी को थोड़ा सहारा देते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भी कुछ हिस्सों में माहौल बनाने में सफल रहता है। हालांकि संपादन और गति फिल्म की कमजोरियों में शामिल हैं। लगभग पूरे रनटाइम में फिल्म अपनी लय खोती हुई नजर आती है।
फिल्म का दूसरा भाग सबसे ज्यादा निराश करता है। जहां कहानी को मजबूत मोड़ लेने चाहिए थे, वहां घटनाएं और ज्यादा उलझ जाती हैं। क्लाइमैक्स भी वह असर नहीं छोड़ पाता जिसकी उम्मीद दर्शक करते हैं। फिल्म खत्म होने के बाद दर्शकों के मन में संतुष्टि की बजाय अधूरापन रह जाता है।
‘मां बहन’ एक ऐसे विचार पर आधारित फिल्म है जिसमें काफी संभावनाएं थीं। रिश्तों की जटिलताओं और सामाजिक व्यंग्य को डार्क कॉमेडी के माध्यम से दिखाना एक दिलचस्प प्रयास हो सकता था। लेकिन कमजोर लेखन और असंतुलित निर्देशन ने इस संभावना को पूरी तरह साकार नहीं होने दिया।
अगर आप केवल माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी के अभिनय के प्रशंसक हैं, तो फिल्म में कुछ ऐसे पल जरूर मिल सकते हैं जो आपको पसंद आएं। लेकिन यदि आप एक सशक्त डार्क कॉमेडी, तीखा व्यंग्य और लगातार मनोरंजन की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है।
कुल मिलाकर ‘मां बहन’ एक ऐसी फिल्म है जो अच्छे कलाकारों और दिलचस्प विचार के बावजूद अपनी कमजोर पटकथा और बिखरे हुए निष्पादन के कारण अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती। यह हंसाने से ज्यादा दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतनी अच्छी स्टारकास्ट के बावजूद फिल्म अपनी मंजिल तक क्यों नहीं पहुंच सकी।