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‘द बंगाल फाइल्स’ रिव्यू: खून-खराबे और हिंसा से भरी फिल्म, दर्शकों में मिली-जुली प्रतिक्रिया

भारतीय सिनेमा में अक्सर ऐसी फिल्में आती हैं जो इतिहास के दर्दनाक पहलुओं को पर्दे पर उतारने की कोशिश करती हैं। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की नई फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है। फिल्म का उद्देश्य बंगाल की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के काले सच को सामने लाना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फिल्म अपनी बात साफ और प्रभावी ढंग से रख पाती है या फिर केवल खून-खराबे और हिंसा तक सिमटकर रह जाती है?

फिल्म की कहानी

‘द बंगाल फाइल्स’ की कहानी बंगाल की ऐतिहासिक घटनाओं और राजनीतिक उथल-पुथल के इर्द-गिर्द घूमती है। निर्देशक ने फिल्म में उस दौर को दिखाने की कोशिश की है, जहां समाज जाति, धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं में बंटा हुआ था। फिल्म में कई घटनाएं वास्तविक लगती हैं, लेकिन उनका प्रस्तुतीकरण इतना हिंसक है कि कई बार दर्शक असहज महसूस करते हैं।

खून-खराबे और मारकाट का बोलबाला

फिल्म में निर्देशक ने हिंसा और खून-खराबे के दृश्यों को भरपूर जगह दी है। हर दूसरे सीन में मारकाट, गोलीबारी और खून की नदियां दिखाई गई हैं। यह सब फिल्म को ज्यादा रियल दिखाने के लिए किया गया होगा, लेकिन दर्शकों को बार-बार यह एहसास होता है कि हिंसा का अतिरेक कहीं न कहीं कहानी की गहराई पर हावी हो गया है।
कई दर्शकों का कहना है कि फिल्म की थीम मजबूत थी, लेकिन इसे परोसने का तरीका बेहद आक्रामक रहा, जिससे फिल्म का प्रभाव कमजोर हो गया।

कलाकारों का अभिनय

फिल्म में कलाकारों ने अपनी ओर से अच्छा काम किया है। मुख्य किरदारों ने जिस दर्द और भय को स्क्रीन पर उतारा, वह कहीं न कहीं दर्शकों तक पहुंचता भी है। पल्लवी जोशी और अन्य कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं को गंभीरता से निभाया है। लेकिन ज्यादा हिंसक दृश्यों के बीच कई बार उनका अभिनय फीका पड़ जाता है और कहानी कमजोर लगने लगती है।

निर्देशन और स्क्रीनप्ले

विवेक अग्निहोत्री का निर्देशन हमेशा से विवादों और चर्चाओं में रहा है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद उनसे दर्शकों को बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन ‘द बंगाल फाइल्स’ में उन्होंने भावनाओं और सच्चाई को दिखाने के बजाय हिंसा को ज्यादा जगह दी है। स्क्रीनप्ले कई बार बिखरा हुआ लगता है और दर्शक कंफ्यूज हो जाते हैं कि कहानी किस दिशा में जा रही है।
फिल्म का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर ठीक-ठाक है, लेकिन यह भी कहानी की कमजोरी को ढक नहीं पाता।

दर्शकों की प्रतिक्रिया

फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे सच को सामने लाने की साहसिक कोशिश मान रहे हैं, तो वहीं कई दर्शकों का कहना है कि फिल्म सिर्फ खून-खराबे और हिंसा से भरी हुई है।
कई लोग इसे देखकर कहते हैं कि फिल्म का ट्रीटमेंट इतना भारी-भरकम है कि दर्शकों का “भेजा फ्राई” हो जाता है। यानी संदेश देने के बजाय यह दर्शकों पर बोझिल साबित होती है।

क्या है खास और क्या है कमजोर?

फिल्म की खासियत इसकी थीम और कलाकारों का समर्पण है। लेकिन कमजोरी है इसकी प्रस्तुति। जरूरत से ज्यादा हिंसा और मारकाट ने कहानी को कमजोर बना दिया है। निर्देशक अगर संतुलन बनाकर चलते, तो फिल्म और असरदार हो सकती थी।


निष्कर्ष

‘द बंगाल फाइल्स’ एक गंभीर विषय पर बनी फिल्म है, लेकिन इसका ट्रीटमेंट दर्शकों को बांधने में नाकाम नजर आता है। खून-खराबे और हिंसा से भरी यह फिल्म हर किसी के लिए देखने योग्य नहीं है। जो दर्शक गहरी कहानियों और भावनात्मक प्रस्तुति की उम्मीद लेकर आएंगे, उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी।


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